पूर्वी षिवनाथ बेसिन में संचालित विभिन्न सिंचाई परियोजनाएं एवं सिंचाई गहनता प्रतिरूप

 

डाॅ. (श्रीमती) उमा गोले

प्रोफेसर, भूगोल अध्ययन षाला, पं. रविषंकर षुक्ल विष्वविद्यालय, रायपुर

 

प्राकृतिक संसाधन के रूप में जल एक महत्वपूर्ण संसाधन है जिसकी उपलब्धता, न्यूनता, अनुपलब्धता एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों को भी प्रभावित करती है। ‘‘जल ही जीवन है’’ जैसे सूत्रवाक्य जल की इसी महत्ता को प्रकट करते हैं। बेसिन एक कृषि प्रधान क्षेत्र है। जहां मानसूनी वर्षा द्वारा कृषि की जाती है। वर्षा की अनियमितता एवं अनिष्चतता के कारण बेसिन में कृषि कार्य करना एक जोखिमपूर्ण कार्य है, क्योंकि ऐसे क्षेत्र में सिंचाई द्वारा ही कृषि उत्पादित की जाती है। फलस्वरूप कृषकों की आर्थिक स्थिति भी सोचनीय है। उल्लेखनीय है कि बेसिन में विभिन्न परियोजनाओं द्वारा 53.93 प्रतिषत भाग सिंचित        है विष्लेषण द्वारा बेसिन में सर्वाधिक सिंचाई गहनता सूचकांक पाटन तहसील एवं सबसे कम डौंडी तहसील में पाया गया जबकि बेसिन में औसत सिंचाई गहनता सूचकांक 45.10 है। अस्तु बेसिन में कृषकों की वर्षा पर निर्भरता कम करके विभिन्न अन्य प्रस्तावित परियोजनाओं को संचालित कर सिंचित क्षेत्र का विस्तार करना महत्वपूर्ण साबित होगा जिस पर सिचाई गहनता निर्भर है।

 

सिंचाई के साधन, सिंचाई परियोजना -वृहद्, मध्यम एवं लधु एवं सिंचाई गहनता

 

प्रस्तावना

आजादी के 70 वर्षो के पश्चात् भी प्रदेश की लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या अपनी आजीविका हेतु प्रत्यक्षतःकृषिएवं उससे संबंधित अन्य व्यवसायों पर निर्भर है। अतः भूमि तथा जल संसाधनों पर बढ़ती जनसंख्या के कारण कृषि योग्य भूमि की कमी तथा चिन्ताजनक ढंग से लगातार नीचे जा रहे भू-जलस्तर के परिणामस्वरूप निरंतर कमी हो रही।

 

अस्तु जल संसाधन को सही ढंग से उपयोग करना अत्यावश्यक है। कृषि के लिए सिंचाई एक अपरिहार्य एवं अनिवार्य तत्व है, बिना जल के कृषि उत्पादन सम्भव नहीं है। पौधों को पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्धता हो तो जुताई एवं अधिक उपज देने वाले उन्नतशील बीजों एवं उर्वरकों की उपादेयता नकारात्मक हो जाती है (पी. कुमार एवं षर्मा, 2008) खेतों को उचित समय पर पर्याप्त मात्रा में जल मिलना चाहिए ,अन्यथा उत्पादन में कमी आती है एवं भूमि से उचित प्रतिफल प्राप्त होने से कृषकांे को आर्थिक हानि होती हैं जिससे प्रदेश में अन्न संकट उत्पन्न होने की स्थिति उत्पन्न ®ती हैं। अर्थात् प्रदेश के सभी गांवों में कृषि विकास हेतु सिंचाई की सुविधा प्रदान करना अति आवश्यक है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ के पूर्वी षिवनाथ बेसिन में विभिन्न  सिंचाई परियोजना का प्रतिरूप को विष्लेषित करने का एक प्रयास है।

 

उद्धेष्य

प्रस्तुत षोध पत्र का मुख्य उद्धेष्य पूर्वी षिवनाथ बेसिन में संचालित विभिन्न सिंचाई परियोजनाएं एवं सिंचाई गहनता का विष्लेषण कर क्षेत्र में सिंचाई प्रतिरूप की समीक्षा कर अध्ययन क्षेत्र में कृषि की स्थिति को सुदृढ़ करना है, जिससे वहां के कृषकों की आय में वृ़िद्ध में सहायक हो सके।

 

अध्ययन क्षेत्र

पूर्वी षिवनाथ बेसिन छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिण -पष्चिम भाग में 200 30’00‘’ से 220 00’ 00‘’ उत्तरी अक्षांश एवं 810 00’ 00‘’ से 820 00’ 00‘’ पूर्वी देषांतर के मध्य स्थित है। बेसिन के उत्तर में बिलासपुर, उत्तर-पूर्व में रायपुर, दक्षिण-पूर्व में धमतरी, दक्षिण में कांकेर, दक्षिण-पष्चिम में राजनांदगाँव और उत्तर-पष्चिम में कबीरधाम जिले स्थित है। प्रदेष का भौगोलिक क्षेत्रफल 8515.01 वर्ग किलोमीटर है। बेसिन के अंतर्गत 12 तहसील यथा- नवागढ़, बेमेतरा, साजा, बेरला, दुर्ग, धमधा, पाटन, गुण्डरदेही, डौण्डी लोहारा, डौण्डी, गुरुर एवं बालोद षामिल हैं। बेसिन की समुद्रतल से औसत ऊँचाई 317 मीटर है। बेसिन में तीन प्रमुख नदियां षिवनाथ, खारुन एवं तांदुला अपवहित है, जो कि कृषि के साथ साथ प्रदेश की आर्थिक स्थिति को भी प्रभावित करती है। यहां जिले की प्रमुख मिट्टी बालुई कन्हार (काली) लाल पीली एवं मटासी मिट्टी प्रमुख हैं।

 

आंकड़ों के स्रोत एवं विधितन्त्र

प्रस्तुत षोध पत्र पूर्णतः द्वितीयक आंकड़ों पर आधारित है। अध्ययन हेतु बेसिन के सम्पूर्ण तहसीलों को इकाई हेतु आधार माना गया है। अध्ययन क्षेत्र में बेसिन के सम्पूर्ण तहसीलों में संचालित विभिन्न सिंचाई परियोजना (वृहद्, मध्यम एवं लघु परियोजना) का आकलन कर कुल निरा फसली क्षेत्र में कुल सिंचित क्षेत्र का प्रतिषत ज्ञात करना साथ ही क्षेत्र में सिंचाई गहनता प्रतिरूप का भी विष्लेषण किया है। प्राप्त आंकड़ों द्वारा अध्ययन को सुगम एवं बोधगम्य बनाने हेतु सारणी एवं उपयुक्त मानचित्रों का भी उपयोग किया गया है।

सिंचाई के साधन

पूर्वी षिवनाथ बेसिन में जल संसाधन की उपलब्धता धरातलीय जल तथा भूमिगत जल के रूप में होती है। धरातलीय जल एवं भूमिगत जल वर्षा आधारित होते है। वर्षा से प्राप्त जल प्रवाहित होकर नदी, नालो, तालाबों में एवं कुछ जल भूमि के परतों से रिसकर भूमि की निचली परतों में चला जाता है, जिसको कुओं नलकूपों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। बेसिन को शिवनाथ, तांदुला, खारून, खरखरा, अमनेर, सोनबरसा, और डोटु नदियांे का वरदान प्राप्त है। नदियो में बांध बनाकर नहर¨ के माध्यम से सिंचाई की जाती है। बेसिन में नहरों से कुल सिंचित क्षेत्र का 37.32 सिंचित किया जाता है। धरातलीय जल के रूप में तालाब एवं अन्य साधन से जिले के कुल कृषि क्षेत्र का 4.7ःसिंचित किया जाता है।

 

बेसिन में धरातलीय जल का दोहन मुख्य रूप से नलकूप के द्वारा किया जाता है। बेसिन के कुल सिंचित क्षेत्र में 56.64 कृषि भूमि पर नलकूप के द्वारा सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। बेसिन में कुंआ एक परम्परागत भूमिगत जल दोहन का साधन है, जो जलस्तर के नीचे चले जाने के कारण वर्तमान समय में उपयुक्त सिंचाई साधन नहीं रहा है, इसी कारण कुओं द्वारा सिंचित क्षेत्र मात्र 0.64 ही प्राप्त हुआ है।

 

 

बेसिन में सबसे अधिक सिंचाई नलकूपों द्वारा 56.64 है, वहीं सिंचाई का दूसरा प्रमुख साधन नहर है जिसके द्वारा 37.32 कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा प्रदान की जाती है। बेसिन में मुख्य रूप से तांदुला, खरखरा, गोंदली ,रूद्री बैराज, खपरी, मरोदा आदि परियोजनाओं से सिंचाई सुविधा प्रदान की जाती है।

सिंचाई परियोजना

देश में असन्तुलित रूप से वितरित जल संसाधन को समन्वित नदी घाटी नियोजन के तहत एक-दूसरे से जोड़कर संतुलित अवस्था में लाने का प्रयास रहा हैं।

 

 

उल्लेखनीय है कि विभिन्न पंचवर्षीय योजना में बढ़ती जनसंख्या, बाढ़ एवं सूखे की आपदाओं की निरन्तरता, पेयजल एवं खाद्यान्न की पर्याप्त मात्रा में आवश्यकता के कारण नदी घाटी परियोजना लाभदायक सिद्ध हुए हैं। सिंचाई परियोजनाओं का मुख्य उद्देश्य अध्ययन क्षेत्र में प्रवाहित नदियों के जल का अधिकतम उपयोग करना एवं सूखे से प्रभावित क्षेत्रों को सिंचाई हेतु जल की आपूर्ति करना है। प्रस्तुत अध्ययन में पूर्वी षिवनाथ बेसिन में प्रवाहित होने वाली महानदी तांदुला नदी से बेसिन में जल पहुँचाने के लिये एक संधि नहर का निर्माण किया गया जो अन्य छोटी नदियांे के जल को जलाषय द्वारा नहरों को जोड़ती हैं। अध्ययन क्षेत्र की सिंचाई परियोजनाओं को तीन भागों मे विभाजित किया गया है- वृहत् सिंचाई परियोजना, मध्यम सिंचाई परियोजनाएं एवं लघु सिंचाई परियोजना

 

वृहत् सिंचाई परियोजना

वृहत् सिंचाई परियोजना के अन्तर्गत वे परियोजनाएँ सम्मिलित की है, जिसके अन्तर्गत 10,000 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि की सिंचाई होती हो। इसमें दुर्ग जिले के तांदुला जलाशय एवं महानदी प्रदायक नहर परियोजनाएँ संलग्न हैं। इनमें दो परियोजनाएं सम्मिलित हैं

 

तांदुला जलाशय

तांदुला जलाशय का निर्माण 1910 में शुरू किया गया था और 1923 में पूर्ण किया गया ,तांदुला जलाशय की लम्बाई 1,4500 फीट और बाँध की अधिकतम ऊँचाई 82 फीट हैं। तांदुला नहर की लम्बाई 880 किलोमीटर हैं, जो लगभग 500 गॅॅाव की कृषि भूमि जो कि 84,320 हेक्टेयर है, को सिंचाई प्रदान करता हैं। तांदुला बांध सूखा एवं तांदुला नदी पर बनाया गया है, जिसका संयुक्त जल ग्रहण क्षेत्र 818 वर्गकिलोमीटर हैं। बाँध में मुख्य रूप से वर्षा जल एवं नदियों से ही जल की प्राप्ति होती हैं। तांदुला जलाशय की रूपांकित सिंचाई क्षमता 68,219 हैं। बाँध मे निर्मित क्षमता 1,03,705 हेक्टेयर है एवं वास्तविक खरीफ सिंचाई 85.94 में प्रदान की जाती हैं। तांदुला जलाशय का पानी गांेदली खरखरा जलाशय को भी प्रदान किया जाता हैं। तांदुला जलाशय से पूर्वी षिवनाथ बेसिन के डौण्डी, बालोद, गुण्डरदेही, पाटन, धमधा, दुर्ग, साजा और बेरला तहसीलों में सिंचाई सुविधा प्रदान किया जाता हैं।

महानदी जलाशय परियोजना

यह एक वृहद सिंचाई परियोजना है इसमें महानदी मुख्य नहर से रूद्री संभाग को जल प्रदान किया जाता है। भिलाई इस्पात संयंत्र को जल प्रदान करने हेतु इस शाखा को तांदुला मुख्य नहर से जोड़ा गया एवं इसी शाखा के द्वारा बेसिन के बालोद तहसील गुरूर तहसील के 86.21 क्षेत्र में सिंचाई सुविधा प्रदान की जाती है।                   

 

 

इसके साथ-साथ महानदी परियोजना मुख्य नहर जो कि धमतरी जिले में स्थित है, से गुरूर तहसील के 21.33 में सिंचाई प्रदान की जा रही है। महानदी जलाशय परियोजना में रूपांकित एवं निर्मित सिंचाई क्षमता 14,323 हेक्टेयर की है ,जिससे 14,323 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई वर्तमान में की जा रही है।

 

मध्यम परियोजना

बेसिन में मध्यम सिंचाई परियोजना के अंतर्गत 5 परियोजनाएँ आती है गांेदली जलाशय, खपरी जलाशय, मरोदा जलाशय, माटियामोती जलाशय, खरखरा जलाशय जिसमें खरखरा मोंहदीपाट, खरखरा आर. बी. सी. खरखरा पूरक नहर एवं कोटेरा माई सम्मिलित हैं। मध्यम परियोजना के अन्तर्गत वे परियोजनाएँ सम्मिलित कि जाती हैं जिससे 2000 से 10,000 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि को सिंचित किया जाता हैं।

 

गोंदली जलाशय

गोंदली जलाशय जुझारा नाला को वर्ष 1953 में बांधकर बनाया गया है जिसमे तांदुला जलाशय का पानी भी पहुचाया जाता हैं। गोंदली जलाशय से 16.79 कृषि भूमि की सिंचाई की जाती हैं। जलाशय की निर्मित क्षमता 4815 हेक्टेयर रूपांकित सिंचाई क्षमता 2105 हेक्टेयर हैं। गोंदली जलाशय का पानी मुख्य रूप से सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है जो कि गुण्डरदेही, डांैण्डी लोहारा बालोद तहसील में मुख्यतः दी जाती हैं।

 

खपरी जलाशय

खपरी जलाशय से 15 ग्रामों मे सिंचाई सुविधा उपलब्ध करायी जाती हैं। खपरी जलाशय से गुण्डरदेही तहसील के 78.28 कृषि योग्य भूमि पर सर्वाधिक सिंचाई सुविधा उपलब्ध करायी जाती हैं।

 

मरोदा जलाशय

मरोदा जलाशय का उपयोग वर्तमान में औद्योगिक क्षेत्र नगरों मे उपयोग हेतु प्रदान किया जा रहा हैं। मरोदा जलाशय की अधिकतम ऊँचाई 21.5 और लम्बाई 19.89 फीट तक हैं।

 

खरखरा मोहंदीपाट जलाशय

खरखरा का जल संग्रहण क्षेत्र 371.66 वर्ग कि.मी. हैं। जलाशय से 59 गांव सिंचाई के लिए जल प्राप्त करते है। खरखरा जलाशय से 34 किलोमीटर मुख्य नहर 8.50 किलोमीटर फिटर नहर निकाली गयी हैं। खरखरा जलाशय का निर्माण खरखरा नदी पर किया गया हैं। खरखरा जलाशय से डौण्डीलोहारा तहसील के 85.35 सिंचाई सुविधा उपलब्ध करायी जाती हैं। खरखरा जलाशय से नई प्रोजेक्ट खरखरा मोंहदीपाट परियोजना 2000 से शुरू और 2009 में पूर्ण हुंई है जो कि 41.15 कृषि भूमि पर सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराती हैं। मटियामोती जलाशय-मटियामोती जलाशय राजनांदगांव दुर्ग जिले के छुरिया डौण्डीलोहारा तहसील में है।

 

खरखरा आर.बी.सी.

खरखरा आर.बी.सी. में रूपांकित एवं निर्मित सिंचाई क्षमता 4049 हेक्टेयर और वास्तविक खरीफ सिंचाई की सुविधा 12.07 पर हंै।

 

खराखरा एल.बी.सी.

खरखरा बायी ओर की नहर प्रणाली में 2024 निर्मित सिंचाई क्षमता और वास्तविक खरीफ सिंचाई 4.24ःपर प्रदान की जाती है।

 

 

खरखरा पूरक नहर

खरखरा पूरक नहर एवं कोटेरा माई में रूपांकित निर्मित क्षमता 382 हेक्टेयर रखी गयी है, जिसमें वास्तविक सिंचाई 1.64 कृषि भूमि पर उपलब्ध होती है।

 

 

लघु सिंचाई परियोजना

लघु सिंचाई परियोजना के अन्तर्गत 2000 हेक्टेयर से कम कृषि योग्य भूमि पर सिंचाई सुविधा उपलब्ध करायी जाती है।

 

 

बेसिन के 12 तहसीलों में लघु परियोजनाएं क्रियान्वित की गई है, जिससे 19.85 कृषि भूमि पर सिंचाई सुविधा उपलब्ध हो पाई प्रदेष में सबसे अधिक नवागढ़ में लघु परियोजनाएं 40 है जिनसे वर्तमान में 51.57 कृषि भूमि पर सिंचाई सुविधा प्रदान की जा रही है वहीं सबसे कम बेरला तहसील में 15 लघु परियोजनाओ सें वर्तमान में 4.41ःमें सिंचाई सुविधा उपलब्ध है।

 

अन्य परियोजनाएं (छत्तीसगढ़ सिंचाई विकास परियोजना)

प्रदेश में स्थित 4 मध्यम एवं 1 वृहद् परियोजना का पुनरूद्धार एवं नवीनीकरण किया जायेगा। बेसिन में राष्ट्रीय जल विकास परियोजना, नदी कछारों का एकीकृत मास्टर प्लान्, तांदुला- आगमेंटेशन योजना एवं जल प्लावन योजना प्रस्तावित है।

 

सिंचाई गहनता

सिंचाई कृषि विकास एवं उत्पादन बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सिंचाई की उपलब्धता तथा कृषि विकास की संभावनाओं का मापन सिंचाई गहनता से किया जाता है। अधिक सिंचाई की गहनता प्रदर्शित करती है कि रोपित क्षेत्र में अधिक सिंचाई की सुविधा है एवं गहन कृषि की जाती है वहीं सिंचाई गहनता का मध्यम स्तर कृषि विकास की संभावनाओं एवं क्षेत्र में निम्न से उच्च गहनता की ओर सतत् विकास का परिचायक होती है। बेसिन में तहसील स्तर पर सिंचाई गहनता सूचकांक के अध्ययन को तीन वर्गों में विभाजित किया गया जिसमें उच्च सिंचाई गहनता सूचकांक के अंतर्गत पाटन ( 65), साजा (61.71), गुरुर ( 60.79), बालोद (60.59) प्राप्त हुए, वहीं मध्यम सिंचाई गहनता बेरला (46.51), धमधा (45.05), गुंडरदेही (43.98) ,बेमेतरा (38.02) एवं दुर्ग (33.19)तहसीलों में प्राप्त हुई। निम्न सिंचाई गहनता सूचकांक बेसिन के तीन तहसील डौंडीलोहारा (26.74) , नवागढ़ (19.54) एवं डौंडी (12.95)में प्राप्त हुई।

 

 

बेसिन में औसत सिंचाई गहनता 45.1 प्राप्त हुई। बेसिन के साजा, पाटन, गुरुर एवं बालोद तहसील में उच्च सिंचाई गहनता की प्राप्ति का मुख्य कारण क्षेत्र में उपस्थित वृहद्, मध्यम और लघु परियोजनाओं से प्राप्त सिंचाई सुविधा है जबकि ऐसे तीन तहसीलों में सिंचाई गहनता कम प्राप्त हुई है, उसका प्रमुख कारण वनाच्छादित क्षेत्र एवं सिंचाई स्रोतों की कमी है।

 

निष्कर्ष

पूर्वी षिवनाथ बेसिन में समस्त स्रोतों से कुल सिंचित क्षेत्र 35 है। बेसिन में सिंचाई कार्यों के लिए जल प्राप्ति मुख्यतः भूमिगत जल एवं भूपृष्ठीय जल पर ही निर्भर है। बेसिन एक कृषि प्रधान क्षेत्र है। जहां मानसूनी वर्षा द्वारा कृषि की जाती है। वर्षा की अनियमितता एवं अनिष्चतता के कारण बेसिन में कृषि कार्य करना एक जोखिमपूर्ण कार्य है, क्योंकि ऐसे क्षेत्र में सिंचाई द्वारा ही कृषि उत्पादित की जाती है। फलस्वरूप कृषकों की आर्थिक स्थिति भी सोचनीय है। उल्लेखनीय है कि बेसिन में विभिन्न परियोजनाओं द्वारा 53.93 प्रतिषत भाग सिंचित है, जबकि बेसिन में औसत सिंचाई गहनता सूचकांक 45.10 है। अस्तु बेसिन में कृषकों की वर्षा पर निर्भरता कम करके विभिन्न अन्य प्रस्तावित परियोजनाओं को संचालित कर सिंचित क्षेत्र का विस्तार करना महत्वपूर्ण साबित होगा जिस पर सिचाई गहनता निर्भर है। 

 

संदर्भ ग्रंथ सूची

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Received on 16.02.2019            Modified on 09.03.2019

Accepted on 28.05.2019            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2): 463-468.